बिरसा मुंडा : जांबाज स्वतंत्रता सेनानी
बिरसा मुंडा : जांबाज स्वतंत्रता सेनानी
स्वतंत्रता संग्राम के दौरान भारतभूमि पर ऐसे कई नायक पैदा हुए जिन्होंने इतिहास में अपना नाम
स्वर्णाक्षरों से लिखवाया. एक छोटी सी आवाज को नारा बनने में देर नहीं लगती बस दम उस आवाज
को उठाने वाले में होना चाहिए और इसकी जीती जागती मिसाल थे बिरसा मुंडा. बिरसा मुंडा ने बिहार
और झारखंड के विकास और भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में अहम रोल निभाया. बिरसा मुंडा विद्रोह
में इतने उग्र थे कि आदिवासी जनता उनको भगवान मानती थी और आज भी आदिवासी जनता
बिरसा को भगवान बिरसा मुंडा के नाम से पूजती है | उन्होंने धर्म परिवर्तन का विरोध किया और
अपने आदिवासी लोगो को हिन्दू धर्म के सिद्धांतो को समझाया था | उन्होंने गाय की पूजा करने और
गौ-हत्या का विरोध करने की लोगो को सलाह दी | उन्होंने अंग्रेज सरकार के खिलाफ नारा दिया था
“रानी का शास खत्म करो और हमारा साम्राज्य स्थापित करो ” | उनके इस नारे को आज भी भारत
के आदिवासी इलाको में याद किया जता है | अंग्रेजो ने आदिवासी कृषि प्रणाली में बदलाव किय
जिससे आदिवासियों को काफी नुकसान होता था |1895 में लगान माफी के लिए अंग्रेजो के विरुद्ध
मोर्चा खोल दिय था | बिरसा मुंडा ने किसानों का शोषण करने वाले ज़मींदारों के विरुद्ध संघर्ष की
प्रेरणा भी लोगों को दी। यह देखकर ब्रिटिश सरकार ने उन्हें लोगों की भीड़ जमा करने से रोका। बिरसा
का कहना था कि मैं तो अपनी जाति को अपना धर्म सिखा रहा हूँ। इस पर पुलिस ने उन्हें गिरफ़्तार
करने का प्रयत्न किया, लेकिन गांव वालों ने उन्हें छुड़ा लिया। शीघ्र ही वे फिर गिरफ़्तार करके दो वर्ष
के लिए हज़ारीबाग़ जेल में डाल दिये गये। बाद में उन्हें इस चेतावनी के साथ छोड़ा गया कि वे कोई
प्रचार नहीं करेंगे।बिरसा ने अंग्रेजो के खिलाफ अपनी एक सेना तैयार की जिसका नाम था गोरिल्ला
सेना | जब बिरसा अपनी सेना के साथ चक्रपुर जम्कोपाई जंगल में आराम कर रहे थे , तब 3 फरवरी
1900 को अंग्रेजी सरकार ने बिरसा और उनके साथ 460 कार्यकर्त्ता को हिरासत में ले लिया इन्हें रांची
की जेल में कैद करके रखा . बिरसा और सभी कार्यकर्ताओं पर बहुत ज्यादा अत्याचार किए गए बहुत
से कार्यकर्त्ता जेल में ही मारे गए और 9 जून 1900 को बिरसा की मौत हो गई . इनकी मौत का कारण
पूछा गया तो ब्रिटिश सरकार ने इन्हें हैजा नामक बीमारी से ग्रसित बताया जबकि उन्हें हैजा होने का
कोई लक्षण नही दिख रहा था . इस प्रकार जेल में ही इनकी मौत हो गई, लेकिन उनके अच्छे कर्मो के
लिए उन्हें आज भी याद किया जाता है | बिरसा मुंडा का जन्म 15 नवम्बर 1875 को रांची जिले के
उलिहतु गाँव में हुआ था |बचपन में मुंडा एक बेहद चंचल बालक थे. अंग्रेजों के बीच रहते हुए वह बड़े
हुए. बचपन का अधिकतर समय उन्होंने अखाड़े में बिताया. हालांकि गरीबी की वजह से उन्हें रोजगार
के लिए समय-समय पर अपना घर बदलना पड़ा. इसी भूख की दौड़ ने ही उन्हें स्कूल की राह दिखाई
और उन्हें चाईबासा इंग्लिश मिडिल स्कूल (Chaibasa at Gossner Evangelical Lutheran
Mission school) में पढ़ने का मौका मिला. चाईबासा में बिताए चार सालों ने बिरसा मुंडा के जीवन
पर गहरा असर डाला. 1895 तक बिरसा मुंडा एक सफल नेता के रुप में उभरने लगे जो लोगों में
जागरुकता फैलाना चाहते थे. 1894 में आए अकाल के दौरान बिरसा मुंडा ने अपने मुंडा समुदाय और
अन्य लोगों के लिए अंग्रेजों से लगान माफी की मांग के लिए आंदोलन किया.मुंडा रीती रिवाज के
अनुसार उनका नाम बृहस्पतिवार के हिसाब से बिरसा रखा गया था | बिरसा के पिता का नाम सुगना
मुंडा और माता का नाम करमी हटू था | उनका परिवार रोजगार की तलाश में उनके जन्म के बाद
उलिहतु से कुरुमब्दा आकर बस गया जहा वो खेतो में काम करके अपना जीवन चलाते थे | उसके बाद
फिर काम की तलाश में उनका परिवार बम्बा चला गया |बिरसा मुंडा का परिवार घुमक्कड़ जीवन
व्यतीत करता था | बिरसा बचपन से अपने दोस्तों के साथ रेत में खेलते रहते थे और थोडा बड़ा होने
पर उन्हें जंगल में भेड़ चराने जाना पड़ता था | जंगल में भेड़ चराते वक़्त समय व्यतीत करने के लिए
बाँसुरी बजाया करते थे और कुछ दिनों बाँसुरी बजाने में उस्ताद हो गये थे | उन्होंने कद्दू से एक एक
तार वाला वादक यंत्र तुइला बनाया था जिसे भी वो बजाया करते थे |1886 से 1890 का दौर के
जीवन का महत्वपूर्ण मोड़ रहा जिसमे उन्होंने इसाई धर्म के प्रभाव में अपने धर्म का अंतर समझा |
उस मस्य सरदार आंदोलन शुरू हो गया था इसलिए उनके पिता ने उनको स्कूल छुडवा दिया था
क्योंकि वो इसाई स्कूलों का विरोध कर रही थी | तब सरदार आन्दोलन की वजह से उनके दिमाग में
इसाइयो के प्रति विद्रोह की भावना जागृत हो गयी थे | बिरसा मुंडा भी सरदार आन्दोलन में शामिल
हो गये थे और अपने पारम्परिक रीती रिवाजो के लिए लड़ना शुरू हो गये थे | तब बिरसा मुंडा
आदिवासियों के जमीन छीनने , लोगो को इसाई बनाने और युवतियों को दलालों द्वारा उठा ले जाने
वाले कुकृत्यो को अपनी आँखों से देखा था जिससे उनके मन में अंग्रेजो के अनाचार के प्रति क्रोध की
ज्वाला भडक उठी थी | आंदोलन का पहला चरण (1895-99) के पीरियड में हुवा था , इस चरण में,
आंदोलन धार्मिक से राजनीतिक आंदोलन में बदल गया। अगस्त 1895 में बिरसा को गिरफ्तार कर
जेल में डाल दिया गया। बाद में क्वीन विक्टोरिया के शासन की डायमंड जुबली की पूर्व संध्या पर
बिरसा को 1897 में जेल से रिहा कर दिया गया। आंदोलन का दूसरा चरण (1899-1900) के पीरियड
में हुवा था , इस चरण में आंदोलन खुली हिंसा और संघर्ष में परिवर्तित होने लगा।इस चरण में, खुंटी
स्टेशन पर हमला किया गया था। आंदोलन का तीसरा चरण (1900-1901) के पीरियड में हुवा , इस
चरण में, बिरसा को 3 फरवरी 1900 को गिरफ्तार किया गया और दो साल के सश्रम कारावास के
लिए दोषी ठहराया गया |
आंदोलन का प्रभाव ये पड़ा कि बिरसा आंदोलन का एक प्रभाव अंग्रेजों की भूमि प्रबंधन प्रणाली पर
पड़ा। 1908 में, आंदोलन के परिणामस्वरूप, छोटा नागपुर में कश्तकारी कानून (Chotanagpur
Tenency Act ) लागू किया गया। छोटा नागपुर टेनेंसी एक्ट आंदोलन का एक और प्रभाव था जो 11
नवंबर 1908 को अस्तित्व में आया। बंधुआ मजदूर की व्यवस्था को समाप्त कर दिया गया।
खूंटकट्टी प्रणाली की मान्यता और प्रणाली की शुद्धता को संरक्षित करने के लिए कदम उठाया
गया।नवंबर 1902 में, गुमला अनुमंडल की स्थापना की गई और 1905 में, खुंटी की स्थापना की
गई।ऐसे जांबाज स्वत्रंत्रता सेनानी और आदिवासियों के देवता स्वरूप थे बिरसा मुंडा |
राजेश भंडारी "बाबू "
साहित्यकार एवं मालवी कवि

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