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त्योहार को मनाने में मूहर्त का चक्कर

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 त्योहार भी फिक्स टाइम के हो गए   पिछले कुछ सालो से त्योहारों पर मुहूर्त देखने का चलन काफी बढ़ गया है। अगर हम पच्चीस तीस साल पीछे जाए तो कोई त्यौहार मुहूर्त देख कर नहीं मनाते थे या यू कहे की मुहूर्त पर एक दूसरे के यहाँ पहुंचना भी आसान नहीं था।  साधन ही नहीं होते थे कई जगह तो सड़क ही नहीं थी फिर बस और बैलगाड़ी होती थी तो जब पहुंच गए तब ही त्यौहार होता था और पुरे दस पंद्रह दिन त्यौहार चलता रहता था। राखी की ही बात करे तो राखी के दिन से लेकर के जन्म अष्ट्मी तक राखी बाँधी जाती थी। ईश्वर का दिया सभी समय ठीक होना चाहिए परन्तु काल की गणना करने वालो ने इसे कई काल खंड में बाटा और शुभ अशुभ मुहूर्त की जानकारी दी।  आम आदमी भी जानकारी के अभाव में मुहूर्त के लिए कोशिश करने लगा और त्यौहार भी मुहूर्त में मनाने लगा। किसी भी शुभ कार्य को करने के लिए मुहूर्त निकालने की आवश्यकता होती है। फिर भी भद्रा का विचार शुभ काम जैसे मुंडन, विवाह, गृहप्रवेश, तीर्थ स्थलों का भ्रमण ,व्यापार या सम्पत्ति की शुरुवात ,आदि काम भद्रा काल में वर्जित है।  लेकिन किसी त्यौहार को मनाने के लिए ,या हवन पूजन...